मानसिक स्वास्थ्य उपचार में सफलता
नेचर मेडिसिन में प्रकाशित एक ऐतिहासिक अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने प्रदर्शित किया है कि साइलोसाइबिन-सहायता प्राप्त थेरेपी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा सेटिंग में उपचार-प्रतिरोधी प्रमुख अवसादग्रस्त विकार (टीआरडी) से पीड़ित वयस्कों के लिए एक व्यवहार्य उपचार विकल्प हो सकती है। इंग्लैंड में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) के तहत आयोजित यह परीक्षण, सबसे चुनौतीपूर्ण मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों में से एक को संबोधित करने में एक महत्वपूर्ण कदम का प्रतिनिधित्व करता है।
यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण में 60 वयस्क शामिल थे जिन्होंने प्रमुख अवसादग्रस्त विकार के लिए पिछले कम से कम दो उपचारों का जवाब नहीं दिया था। प्रतिभागियों को या तो साइलोसाइबिन (कुछ मशरूम में पाया जाने वाला एक साइकेडेलिक यौगिक) मनोवैज्ञानिक सहायता के साथ, या समान सहायता के साथ प्लेसबो प्राप्त हुआ। 06 अगस्त 2026 को ऑनलाइन प्रकाशित परिणाम बताते हैं कि साइलोसाइबिन-सहायता प्राप्त थेरेपी ने नियंत्रण समूह की तुलना में अवसादग्रस्त लक्षणों में चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण कमी लाई।
अध्ययन डिजाइन और पद्धति
यह कठोरता से डिज़ाइन किया गया परीक्षण वास्तविक दुनिया की एनएचएस सेटिंग में आयोजित किया गया था, जिससे यह विशेष शोध सुविधाओं के बाहर साइलोसाइबिन-सहायता प्राप्त थेरेपी का मूल्यांकन करने वाले पहले अध्ययनों में से एक बन गया। प्रतिभागियों को बेतरतीब ढंग से या तो एक उच्च खुराक वाला साइलोसाइबिन सत्र (25 मिलीग्राम) या प्लेसबो (नियासिन) प्राप्त करने के लिए सौंपा गया था, दोनों के साथ खुराक सत्र से पहले, दौरान और बाद में संरचित मनोवैज्ञानिक सहायता दी गई। प्राथमिक परिणाम अवसाद की गंभीरता में परिवर्तन था, जिसे उपचार के बाद सप्ताह 3 पर मोंटगोमरी-आसबर्ग डिप्रेशन रेटिंग स्केल (एमएडीआरएस) का उपयोग करके मापा गया।
परीक्षण डबल-ब्लाइंड था, जिसका अर्थ है कि न तो प्रतिभागियों को और न ही मूल्यांकनकर्ताओं को पता था कि किसे साइलोसाइबिन मिला। यह डिज़ाइन पूर्वाग्रह को कम करता है और निष्कर्षों की वैधता को मजबूत करता है। अध्ययन में किसी भी उपचार प्रभाव की स्थिरता का मूल्यांकन करने के लिए 6 और 12 सप्ताह में दीर्घकालिक अनुवर्ती मूल्यांकन भी शामिल थे।
मुख्य निष्कर्ष: अवसादग्रस्त लक्षणों में महत्वपूर्ण कमी
परिणाम चौंकाने वाले थे। 3 सप्ताह के प्राथमिक समापन बिंदु पर, साइलोसाइबिन समूह ने एमएडीआरएस पैमाने पर औसतन 14.5 अंकों की कमी दिखाई, जबकि प्लेसबो समूह में 5.8 अंकों की कमी आई। यह 8.7 अंकों का अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण और चिकित्सकीय रूप से सार्थक है, क्योंकि कम से कम 7 अंकों की कमी को आम तौर पर चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण सुधार माना जाता है। इसके अलावा, साइलोसाइबिन समूह में प्रतिभागियों का एक महत्वपूर्ण रूप से अधिक अनुपात प्लेसबो समूह की तुलना में छूट (एमएडीआरएस स्कोर ≤ 10 के रूप में परिभाषित) प्राप्त करने में सफल रहा: 35% बनाम 10%।
ये सुधार समय के साथ बने रहे। 12-सप्ताह के अनुवर्ती में, साइलोसाइबिन समूह ने प्लेसबो समूह की तुलना में कम अवसाद स्कोर दिखाना जारी रखा, हालांकि अंतर कुछ हद तक कम हो गया। इससे पता चलता है कि साइलोसाइबिन-सहायता प्राप्त थेरेपी कुछ रोगियों के लिए स्थायी लाभ प्रदान कर सकती है, हालांकि दूसरों के लिए अतिरिक्त सत्र या रखरखाव रणनीतियों की आवश्यकता हो सकती है।
सुरक्षा और सहनशीलता
इस परीक्षण में सुरक्षा सर्वोपरि चिंता थी। सभी खुराक सत्र प्रशिक्षित चिकित्सकों की उपस्थिति में नियंत्रित नैदानिक वातावरण में आयोजित किए गए थे। साइलोसाइबिन समूह में सबसे आम प्रतिकूल घटनाएं क्षणिक सिरदर्द, मतली और सत्र के दौरान हल्की चिंता थीं, जो हस्तक्षेप के बिना हल हो गईं। साइलोसाइबिन से संबंधित कोई गंभीर प्रतिकूल घटना नहीं बताई गई। महत्वपूर्ण बात यह है कि लंबे समय तक मनोविकृति के लक्षण या हेलुसीनोजन पर्सिस्टिंग परसेप्शन डिसऑर्डर (एचपीपीडी) के कोई मामले नहीं थे, जो साइकेडेलिक उपयोग से जुड़े दुर्लभ लेकिन संभावित जोखिम हैं।
शोधकर्ताओं ने जोर दिया कि मनोवैज्ञानिक सहायता घटक उपचार की सुरक्षा और प्रभावकारिता के लिए महत्वपूर्ण था। प्रतिभागियों को सत्र से पहले व्यापक तैयारी और उनके अनुभवों को संसाधित करने में मदद करने के लिए बाद में एकीकरण सत्र प्राप्त हुए। यह मॉडल साइकेडेलिक-सहायता प्राप्त थेरेपी में सर्वोत्तम प्रथाओं के साथ संरेखित है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के लिए निहितार्थ
यह परीक्षण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एनएचएस, एक सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के भीतर आयोजित किया गया था। अवसाद के लिए साइलोसाइबिन पर पिछले अधिकांश अध्ययन निजी शोध सेटिंग्स में आयोजित किए गए थे, जिससे वास्तविक दुनिया के सार्वजनिक स्वास्थ्य संदर्भों में व्यवहार्यता और मापनीयता के बारे में प्रश्न उठते हैं। इस परीक्षण की सफलता बताती है कि साइलोसाइबिन-सहायता प्राप्त थेरेपी को सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों में एकीकृत किया जा सकता है, जो संभावित रूप से अवसाद के लगभग 30% रोगियों के लिए एक नया उपचार विकल्प प्रदान करता है जो पारंपरिक उपचारों का जवाब नहीं देते हैं।
हालांकि, लेखकों ने चेतावनी दी है कि इन निष्कर्षों की पुष्टि करने और इष्टतम खुराक, रोगी चयन मानदंड और एकीकरण प्रोटोकॉल स्थापित करने के लिए बड़े, बहु-केंद्र परीक्षणों की आवश्यकता है। वे यह भी ध्यान देते हैं कि थेरेपी के लिए प्रशिक्षित चिकित्सकों और उपयुक्त नैदानिक सेटिंग्स सहित महत्वपूर्ण संसाधनों की आवश्यकता होती है, जो कार्यान्वयन चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।
विशेषज्ञ दृष्टिकोण और भविष्य की दिशाएं
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने परिणामों को आशाजनक बताते हुए स्वागत किया है, लेकिन सावधानीपूर्वक विचार करने पर जोर दिया है। अध्ययन में शामिल नहीं एक मनोचिकित्सक डॉ. [विशेषज्ञ का नाम] ने टिप्पणी की, "यह परीक्षण मजबूत सबूत प्रदान करता है कि साइलोसाइबिन-सहायता प्राप्त थेरेपी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा सेटिंग में प्रभावी हो सकती है। अगले कदम यह निर्धारित करना है कि चिकित्सकों को कैसे प्रशिक्षित किया जाए, रोगी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, और उपचार को जरूरतमंदों के लिए सुलभ बनाया जाए।"
अध्ययन साइलोसाइबिन के क्रिया तंत्र में आगे के शोध का द्वार खोलता है, जिसके बारे में माना जाता है कि इसमें न्यूरोप्लास्टिकिटी और मस्तिष्क कनेक्टिविटी में परिवर्तन शामिल हैं। भविष्य के अध्ययन यह पता लगा सकते हैं कि क्या साइलोसाइबिन को संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी जैसे अन्य उपचारों के साथ जोड़ा जा सकता है, ताकि परिणामों को बेहतर बनाया जा सके।
निष्कर्ष
एनएचएस में आयोजित इस यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण से पता चलता है कि साइलोसाइबिन-सहायता प्राप्त थेरेपी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा सेटिंग में उपचार-प्रतिरोधी प्रमुख अवसादग्रस्त विकार के लिए एक प्रभावी और सुरक्षित उपचार है। हालांकि बड़े अध्ययनों की आवश्यकता है, ये निष्कर्ष उन लाखों रोगियों के लिए आशा प्रदान करते हैं जिन्होंने पारंपरिक उपचार विकल्पों को समाप्त कर दिया है। जैसे-जैसे साइकेडेलिक चिकित्सा का क्षेत्र आगे बढ़ता है, साइलोसाइबिन मनोरोग टूलबॉक्स में एक मूल्यवान अतिरिक्त बन सकता है।
यह लेख नेचर मेडिसिन की रिपोर्टिंग पर आधारित है। मूल लेख पढ़ें।
Originally published on nature.com






