पार्किंसंस अनुसंधान का नया लक्ष्य

मेयो क्लिनिक के शोधकर्ताओं ने एक क्लिनिकल परीक्षण शुरू किया है, जिसमें यह जाँचा जा रहा है कि लक्षित, कम-खुराक विकिरण चिकित्सा शुरुआती चरण के पार्किंसंस रोग से जुड़ी मस्तिष्क की सूजन को प्रभावित कर सकती है या नहीं। इस अध्ययन को इस स्थिति वाले लोगों में सूजन-रोधी दृष्टिकोण के रूप में कम-खुराक विकिरण की जाँच करने वाला पहला अध्ययन बताया गया है।

यह परीक्षण विकिरण चिकित्सा के पारंपरिक उपयोग पर आधारित नहीं है। विकिरण का संबंध आम तौर पर कैंसर उपचार से होता है, जहाँ अधिक खुराक का उद्देश्य ट्यूमर कोशिकाओं को नष्ट करना और उनकी वृद्धि रोकना होता है। इस अध्ययन में शोधकर्ता बहुत कम, लक्षित खुराक की अलग प्रस्तावित भूमिका—मस्तिष्क के प्रभावित हिस्सों में सूजन कम करने—की जाँच कर रहे हैं।

यह अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्किंसंस रोग का अभी कोई इलाज नहीं है। उपलब्ध देखभाल दवाओं और कुछ लोगों के लिए focused ultrasound या deep brain stimulation जैसी प्रक्रियाओं से लक्षणों को नियंत्रित करने पर केंद्रित है। मेयो का अध्ययन यह देख रहा है कि क्या कोई हस्तक्षेप बीमारी के बढ़ने से जुड़ी जैविक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है, न कि केवल लक्षण उभरने के बाद उनका जवाब दे।

सूजन का अध्ययन क्यों किया जा रहा है

पार्किंसंस रोग तंत्रिका तंत्र का एक गतिशीलता संबंधी विकार है, जो समय के साथ बढ़ता जाता है। इससे गति धीमी होना, कंपकंपी, मांसपेशियों में जकड़न और संतुलन व मुद्रा संबंधी समस्याएँ हो सकती हैं। पार्किंसंस से पीड़ित लोगों में संज्ञानात्मक बदलाव, थकान, अवसाद और चिंता भी हो सकती है।

यह रोग डोपामिन बनाने वाली मस्तिष्क कोशिकाओं के धीरे-धीरे नष्ट होने से जुड़ा है। डोपामिन गति नियंत्रित करने में शामिल एक रसायन है। यह रोग मस्तिष्क कोशिकाओं के भीतर और आसपास असामान्य प्रोटीनों के जमा होने से भी जुड़ा है। शोधकर्ता पार्किंसंस के कारणों और उसके बढ़ने वाले कारकों का अध्ययन जारी रखे हुए हैं।

माना जाता है कि इस रोग-प्रक्रिया में सूजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मेयो क्लिनिक की radiation oncologist और परीक्षण की principal investigator Yasamin Sharifzadeh ने कहा कि शोध यह जाँच रहा है कि कम-खुराक विकिरण पार्किंसंस से जुड़ी किसी अंतर्निहित जैविक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है और संभवतः लक्षणों के बढ़ने को धीमा कर सकता है या नहीं।

यहाँ शब्दों का महत्व है: परीक्षण एक संभावना का अध्ययन कर रहा है, सिद्ध उपचार लाभ की रिपोर्ट नहीं। क्या विकिरण रोगियों के लिए सुरक्षित रूप से सूजन में सार्थक बदलाव ला सकता है और क्या ऐसा बदलाव नैदानिक प्रगति को प्रभावित करता है—इन सवालों की जाँच के लिए अध्ययन बनाया गया है।

विकिरण का जानबूझकर अलग उपयोग

यह परियोजना एक परिचित चिकित्सा तकनीक को नए नैदानिक संदर्भ में रखती है। कैंसर देखभाल में विकिरण चिकित्सा आम तौर पर कैंसर कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाने वाली खुराक का उपयोग करती है। इसके विपरीत, मेयो परीक्षण कम, लक्षित खुराक और उनके संभावित सूजन-रोधी प्रभाव पर केंद्रित है।

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Credit: CC0 Public Domain

इससे यह परीक्षण बीमारी की दिशा बदलने वाली एक परिकल्पना की जाँच का प्रयास बनता है। कंपकंपी या जकड़न को नियंत्रित करने वाला उपचार मूल्यवान हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह बीमारी के बढ़ने से जुड़ी प्रक्रियाओं को बदल दे। शोधकर्ता पूछ रहे हैं कि प्रभावित मस्तिष्क क्षेत्रों में सूजन कम करने से क्या उन प्रक्रियाओं में से किसी पर असर पड़ सकता है।

परीक्षण शुरुआती चरण के पार्किंसंस रोगियों पर केंद्रित है। यह केंद्रितता अध्ययन के सवाल को दर्शाती है, न कि इस दावे को कि यह तरीका इस चरण में प्रभावी है। प्रायोगिक हस्तक्षेप इस समूह में कैसे काम करता है, यह स्थापित करने के लिए क्लिनिकल शोध आवश्यक है।

पार्किंसंस एक समान रोग नहीं है

मेयो क्लिनिक के neurologist और अध्ययन investigator Rodolfo Savica ने कहा कि पार्किंसंस रोग एक समान बीमारी नहीं है। यह संबंधित रोग-उपप्रकारों का समूह है, जो जैविक रूप से अलग हो सकते हैं। यह विविधता सार्वभौमिक उपचार खोजने के प्रयासों को जटिल बनाती है।

शोधकर्ताओं के लिए यह एक केंद्रीय चुनौती है। जो जैविक मार्ग रोगियों के एक समूह में महत्वपूर्ण हो सकता है, उसका दूसरे समूह में उतना महत्व नहीं हो सकता। इसलिए नया परीक्षण पार्किंसंस की प्रक्रियाओं और इससे निदान किए गए लोगों के बीच अंतर समझने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है।

यह क्षेत्र में पूछे जा रहे सवालों में बदलाव को भी रेखांकित करता है। पार्किंसंस को केवल गति संबंधी लक्षणों के समूह के रूप में देखने के बजाय शोधकर्ता मस्तिष्क कोशिकाओं के नष्ट होने, असामान्य प्रोटीनों और सूजन से जुड़ी प्रक्रियाओं का अध्ययन कर रहे हैं। ये प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से जुड़ सकती हैं, लेकिन स्रोत सामग्री यह स्थापित नहीं करती कि विकिरण से सूजन को लक्षित करने पर वे समाप्त हो जाएँगी।

परीक्षण क्या स्थापित कर सकता है और क्या नहीं

क्लिनिकल परीक्षण एक जाँच है, उपचार की सिफारिश नहीं। मेयो के शोधकर्ता यह परख रहे हैं कि कम-खुराक विकिरण सूजन घटा सकता है या नहीं और क्या उस सूजन को संबोधित करने से लक्षणों के बढ़ने की गति धीमी हो सकती है। अध्ययन का अर्थ यह नहीं है कि विकिरण चिकित्सा पार्किंसंस का स्थापित मानक उपचार बन चुकी है।

इसका महत्व उस परिकल्पना में है जिसे यह क्लिनिकल परीक्षण में परखता है। यदि सूजन पार्किंसंस की जैविकी का महत्वपूर्ण हिस्सा है, तो लक्षित सूजन-रोधी रणनीति यह अध्ययन करने का रास्ता दे सकती है कि उस जैविकी को प्रभावित किया जा सकता है या नहीं। यदि इस तरीके से अपेक्षित प्रभाव नहीं मिलता, तब भी निष्कर्ष इस रणनीति की सीमाएँ स्पष्ट करने में मदद करेंगे।

फिलहाल, यह परीक्षण पार्किंसंस अनुसंधान में एक असामान्य और सावधानी से तैयार की गई दिशा जोड़ता है: कैंसर उपचार के लिए प्रसिद्ध तकनीक को बहुत कम खुराक में इस्तेमाल करके मस्तिष्क की सूजन का अध्ययन करना। इसका परिणाम केवल तर्क पर नहीं, बल्कि अध्ययन से मिले प्रमाणों पर निर्भर करेगा।

यह लेख Medical Xpress की रिपोर्टिंग पर आधारित है। मूल लेख पढ़ें।

Originally published on medicalxpress.com