युवा सॉरोपोड अपने आकार से अधिक फुर्तीले हो सकते थे
लंबी गर्दन वाले कुछ डायनासोर शायद उतनी आसानी से पीछे के पैरों पर उठ सकते थे, जितना पेलियोन्टोलॉजिस्ट पहले मानते थे। स्रोत सामग्री में उजागर नए अध्ययन के अनुसार, ब्राज़ील के Uberabatitan और अर्जेंटीना के Neuquensaurus नामक दो दक्षिण अमेरिकी सॉरोपोड्स की जांघ की हड्डियाँ इतनी मजबूत प्रतीत होती हैं कि वे सीधे खड़े होने की मुद्रा को सहारा दे सकती थीं, खासकर जब ये जानवर युवा और हल्के थे।
Palaeontology पत्रिका में प्रकाशित इस शोध ने कम्प्यूटेशनल विश्लेषण का उपयोग कर यह अनुमान लगाया कि जब एक सॉरोपोड अपना भार पिछले पैरों पर स्थानांतरित करता था, तो गुरुत्वाकर्षण और शरीर-भार जांघ की हड्डी पर कितना तनाव डालते। निष्कर्ष यह नहीं था कि ये डायनासोर द्विपादीय रूप से ही रहते थे, बल्कि यह कि सही परिस्थितियों में वे उठकर खड़े हो सकते थे और उल्लेखनीय समय तक उस मुद्रा में बने रह सकते थे।
यह अंतर महत्वपूर्ण है। सॉरोपोड्स को आम तौर पर विशाल, चार पैरों वाले शाकाहारी जानवरों के रूप में देखा जाता है, जिन्हें आकार और स्थिरता परिभाषित करती है, न कि गतिशील संतुलन पर। लेकिन नया विश्लेषण बताता है कि इस समूह के कम-से-कम कुछ मध्यम आकार के सदस्य अस्थायी रूप से अधिक सीधी मुद्रा का उपयोग कर ऊंची पत्तियों तक पहुंचने, खतरों को रोकने, या प्रतिद्वंद्वियों और संभावित साथियों के सामने प्रदर्शन करने में सक्षम हो सकते थे।
डायनासोर की शारीरिक रचना पर इंजीनियरिंग के औज़ार लागू किए गए
यह अध्ययन उन तरीकों पर आधारित था जो जीवाश्म व्याख्या की तुलना में संरचनात्मक इंजीनियरिंग से अधिक जुड़े होते हैं। शोधकर्ताओं ने जांघ की हड्डी पर लगने वाले यांत्रिक भार का मॉडल बनाने के लिए कम्प्यूटेशनल परीक्षणों का इस्तेमाल किया। यह अनुकरण करके कि वह हड्डी उठने की मुद्रा में तनाव को कैसे संभालती, वे यह आकलन कर सके कि ऐसा व्यवहार जैव-यांत्रिक रूप से संभव था या नहीं।
स्रोत पाठ मुख्य परिणाम को स्पष्ट रूप से संक्षेपित करता है: इन दो प्रजातियों जैसे छोटे सॉरोपोड्स की हड्डी और मांसपेशियों की संरचना ऐसी थी कि उनके लिए दो पिछले पैरों पर खड़ा होना, बहुत बड़े सॉरोपोड्स की तुलना में, अधिक आसान और अधिक टिकाऊ था। जैसे-जैसे शरीर का आकार बढ़ता गया, जांघ की हड्डी पर पड़ने वाले बल भी बढ़ते गए, जिससे उस मुद्रा की सुविधा और अवधि घट गई।
आकार-सम्बंधी यह प्रभाव अध्ययन के सबसे महत्वपूर्ण निहितार्थों में से एक है। यह सुझाव देता है कि सॉरोपोड्स में उठकर खड़े होने का व्यवहार पूरे समूह में एक सीधी हां-या-ना वाली विशेषता नहीं था। इसके बजाय, यह प्रजाति, आकार, उम्र, और समग्र शरीर-अनुपात के साथ बदल सकता था। एक विशाल सॉरोपोड और एक बस हाथी-आकार का सॉरोपोड दोनों शरीर के आगे के हिस्से को उठा सकते थे, लेकिन अपेक्षाकृत छोटा या युवा जानवर ही इसे अधिक दक्षता से कर पाता।
युवा अवस्था क्यों महत्वपूर्ण हो सकती थी
स्रोत सामग्री उम्र पर विशेष जोर देती है। Uberabatitan, जो वयस्क अवस्था में 26 मीटर लंबा हो सकता था और जिसे ब्राज़ील का सबसे बड़ा ज्ञात डायनासोर बताया गया है, उसमें भी वृद्धि के साथ उठकर खड़े होने की क्षमता घटती गई होगी। युवा व्यक्तियों में द्रव्यमान कम होता, इसलिए सीधी मुद्रा में पिछले पैरों पर यांत्रिक तनाव भी कम पड़ता। इसके विपरीत, वयस्कों को बढ़ते वजन के कारण कहीं अधिक दबाव झेलना पड़ता।
यह आयु-निर्भर निष्कर्ष सॉरोपोड जीवन-इतिहास की अधिक सूक्ष्म तस्वीर देता है। किशोर और उपवयस्क केवल छोटे आकार के वयस्क नहीं रहे होंगे। वे अलग तरह से व्यवहार भी कर सकते थे, ऐसे चारा-संग्रह या रक्षा-रणनीतियाँ अपनाते हुए जो परिपक्व होने के साथ कम व्यावहारिक हो जातीं। वनस्पति में अधिक ऊँचाई तक पहुँच सकने वाला छोटा जानवर कंधे की ऊँचाई पर उपलब्ध न होने वाले भोजन तक पहुँच सकता था, और साथ ही रक्षा या सामाजिक संदर्भ में अधिक बड़ा या अधिक डरावना भी दिख सकता था।
यह संभावना स्रोत द्वारा सुझाई गई व्यवहारिक व्याख्याओं से मेल खाती है: पेड़ों की ऊपरी पत्तियों तक पहुँचना, शिकारियों को डराना, साथियों को आकर्षित करना, या प्रजनन में मदद करना। अध्ययन ऐसा नहीं लगता कि जीवाश्म रिकॉर्ड में किसी विशिष्ट व्यवहार का प्रमाण होने का दावा करता है। इसके बजाय, यह तर्क देता है कि मूल शरीर-रचना और तनाव सहनशीलता ने उन व्यवहारों को यांत्रिक रूप से संभव बनाया।
विशाल शाकाहारी की छवि पर पुनर्विचार
सामान्य लोगों के लिए, सॉरोपोड सबसे आसानी से पहचाने जाने वाले डायनासोरों में से हैं और सबसे कठिन ऐसे जीव, जिनकी कल्पना किसी फुर्तीले काम में की जाए। उनकी लंबी गर्दन और पूँछ, स्तंभ जैसी टाँगें, और विशाल धड़ मिलकर एक ऐसी छवि बनाते हैं जिसमें जानवर सावधानी से चलते हैं और हमेशा चार पैरों का सहारा लेते हैं। ऐसे निष्कर्ष उस छवि को उलटते नहीं, लेकिन उसे जटिल बना देते हैं।
यह अध्ययन सॉरोपोड्स को नियमित द्विपादीय जानवरों के रूप में नहीं बदलता। बल्कि यह सुझाव देता है कि उनके भीतर स्थिर संग्रहालय-भंगिमा से दिखने वाली स्थिति की तुलना में अधिक व्यवहारिक लचीलापन हो सकता था। अस्थायी रूप से पिछले पैरों पर उठने की मुद्रा ने स्थायी रूप से सीधी देह-रचना विकसित किए बिना भोजन तक पहुंच बढ़ा दी होती। व्यावहारिक रूप से, इससे कुछ जानवर अपनी लंबी गर्दनों के पूरक के रूप में ऊर्ध्वाधर वनस्पति स्तरों का उपयोग कर पाते, न कि उन्हें बदलने के लिए।
यह सामाजिक और रक्षात्मक आयाम भी जोड़ता है। पिछले पैरों पर उठने वाला जानवर अपनी प्रतीत होने वाली ऊंचाई को काफी बढ़ा सकता है, और यह गुण प्रतिद्वंद्विता या धमकी के प्रदर्शन में महत्वपूर्ण हो सकता है, भले ही मुद्रा थोड़ी देर के लिए ही बनी रहे। स्रोत सामग्री स्पष्ट रूप से कहती है कि सीधी मुद्रा शिकारियों को डराने या संभावित साथियों को प्रभावित करने में मदद कर सकती थी। ये परिकल्पनाएँ व्याख्यात्मक हैं, लेकिन वे इस यांत्रिक निष्कर्ष पर आधारित हैं कि यह मुद्रा संभव थी।
यह परिणाम डायनासोर बायोमैकेनिक्स में क्या जोड़ता है
इस तरह के बायोमैकेनिकल अध्ययन तेजी से महत्वपूर्ण हो रहे हैं क्योंकि वे शारीरिक रचना और व्यवहार के बीच सेतु बनाते हैं। जीवाश्म हड्डियाँ संरक्षित करते हैं, गति नहीं, और इसलिए विलुप्त जानवरों के बारे में कई प्रश्न अनुमान के लिए खुले रह जाते हैं। कम्प्यूटेशनल तरीके शोधकर्ताओं को यह जांचने देते हैं कि प्रस्तावित व्यवहार संरचनात्मक रूप से यथार्थवादी है या नहीं, इससे पहले कि यह बहस की जाए कि वह कितनी बार या किस संदर्भ में हुआ होगा।
इस मामले में, यह काम पेलियोन्टोलॉजी के एक व्यापक रुझान में योगदान देता है: विलुप्त जानवरों को अलग-अलग हड्डियों के संग्रह के बजाय ऐसे भौतिक तंत्र के रूप में देखना जिन्हें मॉडल, तनावित, और तुलना किया जा सकता है। यह इस विचार को भी मजबूत करता है कि केवल शरीर का आकार पूरी कहानी नहीं बताता। अलग-अलग हड्डियों का अनुपात और मजबूती यह तय कर सकते हैं कि कोई जानवर क्या कर सकता है, खासकर तब जब शरीर का बड़ा हिस्सा जमीन से उठाने जैसा अत्यधिक भार हो।
व्यापक निहितार्थ यह है कि डाइनोसोरों का व्यवहार उम्र और वंश-रेखा के अनुसार सरल लोकप्रिय चित्रणों की तुलना में अधिक विविध रहा होगा। यदि भविष्य के अध्ययन यही तरीके अन्य सॉरोपोड्स पर लागू करते हैं, तो पेलियोन्टोलॉजिस्टों के पास यह अधिक सूक्ष्म मानचित्र हो सकता है कि कौन-सी प्रजातियाँ, किस जीवन-चरण में, और कितनी देर तक प्रभावी रूप से उठकर खड़ी हो सकती थीं।
फिलहाल, यह अध्ययन दृष्टिकोण में एक संक्षिप्त लेकिन अर्थपूर्ण बदलाव देता है। कुछ सॉरोपोड बस इतने बड़े नहीं थे कि वे उठ न सकें। कम-से-कम युवावस्था में, और कम-से-कम कुछ प्रजातियों में, उनके पास सीधे खड़े होने लायक बनावट थी।
यह लेख Science Daily की रिपोर्टिंग पर आधारित है। मूल लेख पढ़ें.
Originally published on sciencedaily.com


