ऐसा प्रतीत होता है कि जापान के किकाई कैल्डेरा के नीचे नया मैग्मा जमा हो रहा है। यह अधिकांशतः समुद्र के नीचे स्थित ज्वालामुखीय तंत्र है, जिसमें लगभग 7,300 वर्ष पहले एक विशाल विस्फोट हुआ था। कोबे यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने समुद्र के भीतर किए गए भूकंपीय सर्वेक्षणों का उपयोग करके मैग्मा के एक बड़े भंडार के प्रमाणों की पहचान की है। इससे यह दुर्लभ जानकारी मिलती है कि किसी विनाशकारी घटना के बाद कोई विशाल कैल्डेरा अपने मैग्मा भंडार को कैसे दोबारा बना सकता है।

यह खोज निकट भविष्य में होने वाले विस्फोट का पूर्वानुमान नहीं है। इसके बजाय, यह एक दीर्घकालिक वैज्ञानिक प्रश्न पर केंद्रित है: पृथ्वी पर सबसे बड़े विस्फोटों में सक्षम ज्वालामुखीय तंत्र दोबारा विस्फोट करने के लिए आवश्यक असाधारण मात्रा में मैग्मा की आपूर्ति कैसे करते हैं? वैज्ञानिकों के पास इस प्रक्रिया की सीमित जानकारी है, जिससे उन स्थितियों को पहचानना कठिन हो जाता है जो विशाल कैल्डेरा में फिर से सक्रियता से पहले दिखाई दे सकती हैं।

किकाई इस समस्या के अध्ययन के लिए सबसे बेहतर स्थानों में से एक है। कैल्डेरा का अधिकांश हिस्सा जापान के दक्षिण में समुद्र के नीचे स्थित है, और लगभग 7,300 वर्ष पहले हुआ इसका विशाल विस्फोट होलोसीन का सबसे बड़ा ज्ञात विस्फोट बताया जाता है। होलोसीन वह भूवैज्ञानिक युग है जो लगभग 11,700 वर्ष पहले शुरू हुआ था। नए प्रमाणों से संकेत मिलता है कि उस प्राचीन घटना के बाद से इस स्थल के नीचे मैग्मा जमा हो रहा है।

दोबारा बन रहे ज्वालामुखीय तंत्र की एक झलक

बड़े विस्फोटक उद्गार इतनी विशाल मात्रा में मैग्मा बाहर निकाल सकते हैं कि खाली हुए भंडार के ऊपर की जमीन धंस जाती है। इससे बनी चौड़ी और अपेक्षाकृत उथली द्रोणिका को कैल्डेरा कहा जाता है। जापान का किकाई, अमेरिका का येलोस्टोन और इंडोनेशिया का टोबा इस तरह की अत्यधिक गतिविधि से जुड़े प्रसिद्ध ज्वालामुखीय तंत्रों में शामिल हैं।

यह समझना आसान नहीं है कि किसी बड़े विस्फोट के बाद ऐसे तंत्र कैसे उबरते हैं। इसमें शामिल मैग्मा की मात्रा बहुत विशाल होती है, और वैज्ञानिकों के पास अभी तक इस बात की पूरी तस्वीर नहीं है कि हजारों वर्षों के दौरान भूमिगत रूप से इसकी आपूर्ति, भंडारण और बदलाव कैसे होते हैं। यही अनिश्चितता उन कारणों में से एक है जिनकी वजह से यह अनुमान लगाना कठिन रहता है कि कोई बड़ा कैल्डेरा दोबारा कब या क्या विस्फोट कर सकता है।

कोबे यूनिवर्सिटी के शोध में किकाई की भूमिगत संरचना की जांच के लिए समुद्र के नीचे एकत्र किए गए भूकंपीय अवलोकनों का उपयोग किया गया। भूकंपीय सर्वेक्षणों में ध्वनि तरंगों और चट्टानों के भीतर उनके परावर्तन या व्यवहार का उपयोग करके ऐसी विशेषताओं का पता लगाया जाता है जिन्हें सीधे देखा नहीं जा सकता। इस मामले में, अवलोकन कैल्डेरा के नीचे नए मैग्मा के एक बड़े भंडार की ओर संकेत करते हैं।

यह खोज क्या दिखाती है और क्या नहीं

अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष यह प्रमाण है कि किकाई के नीचे मैग्मा का भंडार दोबारा बन रहा है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि होलोसीन के सबसे बड़े विस्फोटों में से एक के बाद मैग्मा की पुनःपूर्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण ज्वालामुखी विज्ञान के लिए एक उपयोगी अध्ययन का अवसर प्रदान करता है। इससे शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद मिल सकती है कि कैल्डेरा बनाने वाले विस्फोट के बाद विशाल मैग्मा तंत्र कैसे विकसित होते हैं।

लेकिन मैग्मा का जमा होना अपने आप में कोई समय-सारिणी नहीं बताता। उपलब्ध रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि वैज्ञानिकों को अभी भी उन प्रक्रियाओं के बारे में बहुत कम जानकारी है जो सुपरवोल्केनो के दोबारा फटने का कारण बनती हैं और इसलिए वे पूर्वानुमान लगाने की स्थिति में नहीं हैं। इस शोध को इस चेतावनी के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि किकाई जल्द ही अपने प्राचीन विस्फोट को दोहराने वाला है।

इसके बजाय, यह ऐसी जानकारी प्रदान करता है जो भविष्य में सामान्य भूमिगत बदलावों और उन स्थितियों के बीच अंतर करने के प्रयासों को बेहतर बना सकती है, जो ज्वालामुखीय जोखिम के आकलन के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं। लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले ज्वालामुखीय तंत्र बहुत अलग-अलग समय-मानों पर विकसित हो सकते हैं, और मैग्मा की पुनःपूर्ति से लेकर विस्फोट तक की प्रक्रिया अभी पूरी तरह समझी नहीं गई है।

जापान से आगे किकाई का महत्व

किकाई का इतिहास इसे ऐसे सवालों के अध्ययन के लिए एक प्राकृतिक प्रयोगशाला बनाता है, जिनके प्रभाव जापानी द्वीपसमूह से कहीं आगे तक हैं। यह तंत्र शोधकर्ताओं को यह जांचने का अवसर देता है कि कोई ज्वालामुखी बहुत बड़े विस्फोट के बाद कैसे दोबारा बनता है और फिर इन अवलोकनों की तुलना अन्य कैल्डेरा से की जा सकती है। येलोस्टोन और टोबा का उल्लेख अक्सर किकाई के साथ किया जाता है, क्योंकि ये सभी ऐसे विशाल ज्वालामुखीय तंत्रों के उदाहरण हैं जिन्हें वैज्ञानिक अधिक स्पष्ट रूप से समझना चाहते हैं।

इसलिए यह शोध बड़े कैल्डेरा क्षेत्रों में मैग्मा के जमा होने के संकेतों की पहचान करने के व्यापक प्रयास में योगदान दे सकता है। मैग्मा कहां स्थित है, उसकी मात्रा कितनी हो सकती है और समय के साथ उसमें कैसे बदलाव आता है, इसकी बेहतर जानकारी निगरानी के वैज्ञानिक आधार को मजबूत कर सकती है। इससे अनिश्चितता समाप्त नहीं होगी, लेकिन भविष्य के अवलोकनों को अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है।

यह अध्ययन समुद्री भूभौतिकीय शोध के महत्व को भी रेखांकित करता है। किकाई का अधिकांश हिस्सा समुद्र के नीचे है, जिससे ज्वालामुखीय तंत्र के महत्वपूर्ण हिस्से केवल जमीन-आधारित अवलोकनों की पहुंच से बाहर हैं। समुद्र के भीतर किया गया भूकंपीय कार्य समुद्र तल के नीचे की संरचनाओं का मानचित्रण करके और उन प्रक्रियाओं को उजागर करके इस कमी को दूर करने में मदद कर सकता है, जो अन्यथा छिपी रहतीं।

खोज से तैयारी तक

ज्वालामुखी विज्ञान में एक अकेले माप से निर्णायक जोखिम आकलन शायद ही कभी संभव होता है। निगरानी और व्याख्या कई प्रकार के प्रमाणों पर निर्भर करती है, और उपलब्ध स्रोत सामग्री यह दावा नहीं करती कि इस अध्ययन ने पूर्वानुमान की चुनौती हल कर दी है। इसका महत्व इस बात में है कि यह किसी अत्यधिक विस्फोट के बाद विशाल कैल्डेरा के व्यवहार से जुड़े सीमित रिकॉर्ड में एक नया अवलोकन जोड़ता है।

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़े विस्फोटों के परिणाम अत्यंत गंभीर हो सकते हैं, जबकि उनसे जुड़े भूमिगत तंत्रों का अध्ययन कठिन होता है। मैग्मा की पुनःपूर्ति की अधिक स्पष्ट समझ शोधकर्ताओं को भविष्य के सर्वेक्षणों और निगरानी कार्यक्रमों के लिए बेहतर सवाल विकसित करने में मदद कर सकती है। समय के साथ, किकाई और अन्य कैल्डेरा की तुलना से यह पता चल सकता है कि किन भूमिगत बदलावों पर निगरानी रखना सबसे उपयोगी है।

फिलहाल, किकाई के नीचे पाया गया नया मैग्मा हजारों वर्षों से चल रही एक प्रक्रिया के बारे में वैज्ञानिक संकेत है। इससे पता चलता है कि होलोसीन के विस्फोट के बाद कैल्डेरा केवल खाली नहीं रह गया था। इसके बजाय, ऐसा प्रतीत होता है कि वह उस भूमिगत भंडार के एक हिस्से को दोबारा बना रहा है, जिसने पृथ्वी की सबसे महत्वपूर्ण ज्वालामुखीय घटनाओं में से एक को शक्ति दी थी। इससे शोधकर्ताओं को एक विशाल ज्वालामुखीय तंत्र के दीर्घकालिक पुनर्निर्माण का अध्ययन करने का अवसर मिलता है।

यह लेख Science Daily की रिपोर्टिंग पर आधारित है। मूल लेख पढ़ें।

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