RIMPAC लॉजिस्टिक्स को एक तकनीकी प्रयोग में बदलता है
अमेरिकी सेना 2026 के Rim of the Pacific अभ्यास का उपयोग यह परखने के लिए कर रही है कि क्या स्वायत्त जहाज़, मोबाइल 3D प्रिंटर, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रशांत महासागर की विशाल दूरियों में बलों को बनाए रखना आसान बना सकते हैं। यह प्रयास एक बुनियादी लेकिन कठिन समस्या पर केंद्रित है: जब पुर्ज़े प्रमुख आपूर्ति केंद्रों से दूर टूटते हैं, तो उपकरणों की मरम्मत मिशन से भी कठिन हो सकती है।
यह चुनौती नई नहीं है, लेकिन प्रशांत का पैमाना इसे असाधारण तात्कालिकता देता है। हज़ारों मील का समुद्र जहाज़ों, ठिकानों और पुनःपूर्ति बिंदुओं को अलग करता है, और किसी भी विवादित वातावरण में यह दूरी और भी बड़ा परिचालन बोझ बन जाती है। RIMPAC में, सैन्य अधिकारी यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या advanced manufacturing और uncrewed transport, आवश्यक घटकों को संचालन स्थल के करीब बनाकर और पहुँचाकर उस बोझ को कम कर सकते हैं।
Rear Adm. Michael Mattis ने इस प्रयास को अमेरिकी सेना का अब तक का सबसे बड़ा advanced manufacturing demonstration बताया। U.S. Pacific Command Joint Advanced Manufacturing Center में एक मीडिया कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि अभ्यास का उपयोग यह देखने के लिए किया जा रहा है कि joint force के लिए theater-wide advanced manufacturing कैसा दिख सकता है।
RIMPAC इतना बड़ा है कि वह एक सार्थक test bed बन सके। Mattis के अनुसार, इस वर्ष के अभ्यास में 38 देश, 31 surface vessels, पाँच submarines, 30,000 से अधिक personnel, लगभग 180 aircraft, और landings में शामिल 1,100 से अधिक personnel शामिल हैं। यह पैमाना sustainment को लैब के बजाय वास्तविक stress test बना देता है।
निर्माण, स्वायत्तता और AI का संयोजन
इस प्रयोग का समन्वय Fleetwerx और Naval Postgraduate School के Consortium for Advanced Manufacturing Research and Education द्वारा किया जा रहा है। Marine Lt. Col. Michael Radigan ने कहा कि यह काम advanced manufacturing, autonomous systems, और artificial intelligence को एक साथ लाकर joint force को आवश्यक पुर्ज़े पहुँचाने का प्रयास है।
व्यावहारिक रूप से, विचार यह है कि डिजिटल डिज़ाइन और निर्माण क्षमता को आवश्यकता के बिंदु के करीब लाया जाए, बजाय इसके कि पूरी तरह पारंपरिक supply chain पर निर्भर रहा जाए। अगर कोई component खराब हो जाए, तो कोई unit उसे स्थानीय या क्षेत्रीय स्तर पर बना सकता है, और फिर autonomous या semi-autonomous साधनों से उसे जहाज़ या दूरस्थ स्थान तक पहुँचा सकता है। यही वह दृष्टि है जिसका मूल्यांकन अब सेवाएँ वास्तविक परिचालन परिस्थितियों में करना चाहती हैं।
Radigan ने इस महत्वाकांक्षा को समझाने के लिए consumer-tech analogy का उपयोग किया, और कहा कि लक्ष्य मांग पर उच्च गति और उच्च गुणवत्ता के साथ निर्माण करना है, यहाँ तक कि contested environments में भी। तुलना का यह चयन समय को कम करने में सैन्य रुचि को रेखांकित करता है, यानी आवश्यकता पहचानने और ऑपरेटर के हाथ में उपयोगी पुर्ज़ा पहुँचने के बीच का अंतर।
मूल पाठ में USS Essex पर 3D printer के लिए पुर्ज़े पहुँचाने वाले autonomous Typhoon surface vessel का भी उल्लेख है। यह उदाहरण अभ्यास की तर्कसंगति को पकड़ता है। लंबी पुनःपूर्ति श्रृंखला पर निर्भर रहने के बजाय, सेना एक अधिक विकेन्द्रीकृत प्रणाली की जाँच कर रही है जिसमें निर्माण और डिलीवरी को कई मॉड्यूलर चरणों में बाँटा जा सकता है, जिनमें से कुछ स्वचालित हैं।
प्रशांत क्षेत्र समीकरण क्यों बदलता है
सैन्य रसद विशेषज्ञ अक्सर प्रशांत क्षेत्र की tyranny of distance की बात करते हैं, क्योंकि भूगोल ही मरम्मत, पुनःपूर्ति, और बलों की आवाजाही को धीमा कर देता है। कोई ऐसा खराब पुर्ज़ा जो महाद्वीपीय depot के पास आसानी से बदल दिया जाए, वह तब बड़ी ऑपरेशनल समस्या बन सकता है जब निकटतम support node समुद्र, सीमित transport availability, या कमजोर lines of communication से अलग हो।
इसी कारण advanced manufacturing ने रक्षा योजना में बढ़ती दिलचस्पी हासिल की है। एक ऐसा प्रिंटर जिसे आगे तैनात किया जा सके, या यहाँ तक कि स्थिति में गिराया जा सके, logistics समस्या की संरचना बदल देता है। अब प्रश्न यह नहीं रहता कि किसी warehouse से physical spare कितनी जल्दी पहुँचेगा, बल्कि यह होता है कि क्या raw material, digital design files, और स्थानीय fabrication capability readiness को तेज़ी से बहाल करने के लिए पर्याप्त हैं।
स्वायत्त प्रणालियों का हिस्सा इसी तरह महत्वपूर्ण है। self-driving surface vessels या अन्य uncrewed platforms द्वारा आपूर्ति ले जाने से कर्मियों के लिए जोखिम कम हो सकता है और तब भी माल प्रवाहित रह सकता है जब पारंपरिक परिवहन पर दबाव हो। सिद्धांततः, यह छोटी और अधिक बिखरी हुई formations का भी समर्थन कर सकता है, जिन्हें निशाना बनाना कठिन है लेकिन पारंपरिक तरीकों से बनाए रखना कठिन होता है।
Artificial intelligence यहाँ एक समन्वयक और अनुकूलक के रूप में आती है। यद्यपि स्रोत पाठ तकनीकी विवरण नहीं बताता, अधिकारी AI को उस प्रणाली का हिस्सा मानते हैं जो निर्माण, माँग, और डिलीवरी को जोड़ने में मदद करती है। ऐसे theater में जहाँ समय और दूरी दोनों लागत बढ़ाते हैं, कोई भी ऐसा साधन जो routing, prioritization, या part selection बेहतर करे, मूल्यवान हो सकता है।
प्रदर्शन से सिद्धांत तक
बड़ा प्रश्न यह है कि क्या ये तकनीकें आशाजनक प्रदर्शन से विश्वसनीय युद्धकालीन अभ्यास तक पहुँच सकती हैं। सैन्य प्रयोग अक्सर नियंत्रित परिस्थितियों में यह दिखाते हैं कि क्या संभव है। कठिन काम यह साबित करना है कि यह विभिन्न सेवाओं और सहयोगी बलों के बीच repeatable, reliable, quality assurance के साथ और interoperable रूप से काम करता है।
RIMPAC इन सवालों का उत्तर शुरू करने का दुर्लभ अवसर देता है क्योंकि इसमें बहुराष्ट्रीय भागीदारी और समुद्री पैमाना दोनों हैं। यदि सेना यह जानना चाहती है कि advanced manufacturing विकेन्द्रीकृत बल का समर्थन कर सकता है या नहीं, तो उसे केवल printers या drones को अलग-अलग नहीं, बल्कि design, certification, production, transport, और end use को जोड़ने वाली पूरी श्रृंखला को परखना होगा।
गुणवत्ता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। तेज़ी से पहुँचा replacement part तभी उपयोगी है जब वह आवश्यक मानक पर खरा उतरे। इसलिए advanced manufacturing programs को केवल speed और proximity ही नहीं, बल्कि validation और trust भी हल करना होगा। स्रोत सामग्री high-quality parts पर ज़ोर देती है, जो इस बात की समझ दिखाती है कि logistics innovation परिचालन सुरक्षा की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
Autonomy के साथ भी यही बात लागू होती है। एक uncrewed vessel जो nodes के बीच parts ले जा सके, तभी मूल्यवान है जब वह वास्तविक परिस्थितियों में भरोसेमंद ढंग से ऐसा कर सके। इसलिए RIMPAC जैसी exercises success दिखाने जितना ही failure points पहचानने के बारे में भी हैं।
यह परीक्षण क्या संकेत देता है
अभी शुरुआती चरण में भी RIMPAC का यह प्रयास सैन्य sustainment को देखने के तरीके में एक व्यापक बदलाव दिखाता है। logistics अब केवल भंडारण और परिवहन तक सीमित नहीं मानी जा रही। यह अपने आप में एक technology domain बनती जा रही है, जिसे software, automation, digital manufacturing, और distributed operations आकार दे रहे हैं।
यह बदलाव Indo-Pacific की परिचालन आवश्यकताओं से मेल खाता है, जहाँ resilience इस बात पर निर्भर हो सकती है कि कुछ fixed hubs पर निर्भर हुए बिना बलों को कैसे आपूर्ति मिलती रहे। स्थानीय fabrication, autonomous delivery, और AI-assisted coordination का एक नेटवर्क, अगर काम कर गया, तो उस posture को अधिक व्यावहारिक बना सकता है।
2026 का अभ्यास यह सिद्ध नहीं करता कि समस्या हल हो गई है। लेकिन यह दिखाता है कि Pentagon अपना प्रयास कहाँ लगा रहा है: supply chains को छोटा करना, production को विकेन्द्रीकृत करना, और यह परखना कि क्या नए साधन सैन्य अभियानों की सबसे पुरानी बाधाओं में से एक को कम कर सकते हैं। प्रशांत में दूरी समाप्त नहीं होगी। RIMPAC में दांव इस बात पर है कि स्मार्ट manufacturing और delivery systems उसे कम तकलीफ़देह बना सकती हैं।
यह लेख Defense One की रिपोर्टिंग पर आधारित है। मूल लेख पढ़ें.
Originally published on defenseone.com


