दशकों से सिस्टमिक स्क्लेरोसिस में त्वचा की भागीदारी का आकलन करने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रमुख साधनों में से एक बेहद सरल रहा है: चिकित्सक मरीज की त्वचा को चुटकी में लेकर उसके मोटेपन का स्पर्श से अनुमान लगाता है। यह पद्धति निदान, रोग के आकलन और उपचार की निगरानी का स्वीकृत हिस्सा बनी हुई है, लेकिन स्वभावतः व्यक्तिपरक है। दो चिकित्सक एक ही मरीज को अलग-अलग अंक दे सकते हैं, जिससे यह तय करना कठिन हो जाता है कि त्वचा का फाइब्रोसिस बढ़ रहा है, स्थिर है या उपचार का जवाब दे रहा है।

बोस्टन यूनिवर्सिटी चोबानियन एंड अवेडिसियन स्कूल ऑफ मेडिसिन और विश्वविद्यालय के बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ताओं ने अब इस प्रक्रिया में अधिक वस्तुनिष्ठ जानकारी जोड़ने के उद्देश्य से कैमरा-आधारित पद्धति का परीक्षण किया है। इस तकनीक को spatial frequency domain imaging या SFDI कहा जाता है। इसमें सुरक्षित पैटर्न वाली रोशनी का उपयोग किया जाता है और त्वचा से परावर्तित होने के तरीके को मापा जाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, उनके काम में पहली बार इस तकनीक को स्क्लेरोडर्मा पर लागू किया गया है।

त्वचा में बदलावों का मापन क्यों महत्वपूर्ण है

सिस्टमिक स्क्लेरोसिस, जिसे अक्सर स्क्लेरोडर्मा कहा जाता है, एक दुर्लभ दीर्घकालिक ऑटोइम्यून बीमारी है। यह शरीर को अत्यधिक कोलेजन बनाने के लिए प्रेरित कर सकती है, जिससे त्वचा और कुछ मामलों में आंतरिक अंगों में मोटापन और कठोरता आ सकती है। इसलिए त्वचा की भागीदारी केवल बीमारी की दिखाई देने वाली विशेषता नहीं है; यह चिकित्सकों द्वारा इसके विस्तार और प्रगति को समझने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला महत्वपूर्ण संकेतक भी है।

चुनौती यह है कि पारंपरिक त्वचा स्कोरिंग काफी हद तक जांचकर्ता के स्पर्श-आधारित आकलन पर निर्भर करती है। इससे आकलन अनुपयोगी नहीं हो जाता, लेकिन जब बदलाव सूक्ष्म हों या परिणामों की समय के साथ और अलग-अलग देखभाल टीमों के बीच तुलना करनी हो, तब इसकी सटीकता सीमित हो सकती है। बिना संपर्क के लगातार दोहराया जा सकने वाला मापन, शारीरिक जांच और अन्य परीक्षणों के साथ चिकित्सकों को प्रमाण का एक अतिरिक्त स्रोत दे सकता है।

SFDI को बायोप्सी या सीधे संपर्क के बिना ऐसा करने के लिए तैयार किया गया है। यह प्रणाली त्वचा पर प्रकाश के पैटर्न डालती है और लौटने वाली रोशनी का विश्लेषण करती है। ये ऑप्टिकल मापन ऊतक के उन गुणों में अंतर दिखा सकते हैं, जो सामान्य दृश्य निरीक्षण में आसानी से नजर नहीं आते।

शोधकर्ताओं ने क्या पाया

अपने अध्ययन में बोस्टन यूनिवर्सिटी की टीम ने बताया कि स्क्लेरोडर्मा से पीड़ित लोगों और स्वस्थ व्यक्तियों के बीच प्रकाश मापों में अंतर था। ये मापन त्वचा की मोटाई और फाइब्रोसिस या घाव बनने की प्रक्रिया से भी संबंधित थे।

समूह ने इमेजिंग परिणामों की तुलना त्वचा की बायोप्सी में देखे गए कोलेजन संचय से की और ऑप्टिकल संकेत को उस जैविक बदलाव से जोड़ा, जिसे यह तकनीक मापने के लिए बनाई गई है। उन्होंने रीडिंग की तुलना त्वचा की मोटाई के अल्ट्रासाउंड माप और मानक नैदानिक त्वचा स्कोर से भी की। इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने यह आकलन किया कि मापन कितनी बार समान परिणाम देते हैं।

एक खास तौर पर उल्लेखनीय अवलोकन यह था कि उन त्वचा क्षेत्रों में भी रीडिंग अलग थीं, जिन्हें चिकित्सकों ने सामान्य अंक दिया था। इससे यह साबित नहीं होता कि ऐसा हर अंतर चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण बीमारी को दर्शाता है। हालांकि, यह संकेत जरूर मिलता है कि इमेजिंग पद्धति ऐसे त्वचा बदलावों के प्रति संवेदनशील हो सकती है, जो नियमित जांच के दौरान स्पष्ट नहीं होते।

यह संभावना उस बीमारी में महत्वपूर्ण है जिसमें बदलाव का जल्दी पता लगने से मरीज की स्थिति पर नजर रखने की क्षमता बेहतर हो सकती है। अध्ययन SFDI को मौजूदा आकलन पद्धतियों के संभावित पूरक के रूप में प्रस्तुत करता है, न कि नैदानिक विशेषज्ञता या देखभाल और शोध में पहले से इस्तेमाल किए जा रहे स्थापित मापों के विकल्प के रूप में।

शोध उपकरण से नैदानिक साधन तक

सह-लेखक डैरेन रोब्लायर की प्रयोगशाला में SFDI पर लगभग 15 वर्षों से विकास कार्य चल रहा है। इसे स्क्लेरोडर्मा पर लागू करने के लिए यह जांचना जरूरी था कि ऑप्टिकल रीडिंग को बीमारी की महत्वपूर्ण विशेषताओं, जिनमें कोलेजन का संचय और त्वचा का मोटा होना शामिल हैं, से जोड़ा जा सकता है या नहीं। बायोप्सी निष्कर्षों, अल्ट्रासाउंड और नैदानिक स्कोरों के साथ की गई रिपोर्टेड तुलनाएं इस सत्यापन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

तकनीक की गैर-आक्रामक प्रकृति बार-बार निगरानी के लिए भी उपयोगी हो सकती है। त्वचा की बायोप्सी सीधे ऊतक संबंधी जानकारी दे सकती है, लेकिन वे आक्रामक होती हैं और उन्हें सहजता से या बार-बार नहीं किया जा सकता। कैमरा-आधारित मापन नियमित जांच के दौरान सैद्धांतिक रूप से किया जा सकता है, जिससे त्वचा के गुणों का अधिक निरंतर रिकॉर्ड तैयार हो सके।

फिर भी, इन निष्कर्षों को इमेजिंग पद्धति के शुरुआती नैदानिक उपयोग के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि इस प्रमाण के रूप में कि नियमित स्क्लेरोडर्मा आकलन बदलने के लिए तैयार हैं। स्रोत सामग्री एक विकसित और परीक्षण की गई तकनीक का वर्णन करती है, लेकिन व्यापक नैदानिक उपयोग, नियामकीय मंजूरी या मरीजों के बेहतर परिणाम स्थापित नहीं करती। यह तय करने के लिए बड़े अध्ययनों और विभिन्न देखभाल स्थितियों में व्यावहारिक परीक्षणों की जरूरत होगी कि मापों की व्याख्या कैसे की जानी चाहिए और क्या वे उपचार संबंधी निर्णयों को प्रभावित करते हैं।

अधिक सुसंगत निगरानी की कोशिश

इस शोध का महत्व इस प्रयास में है कि स्पर्श पर बहुत अधिक निर्भर आकलन को ऐसे आकलन में बदला जाए जिसे मात्रात्मक रूप से भी दर्ज किया जा सके। यदि आगे इसका सत्यापन होता है, तो SFDI पर्यवेक्षकों के बीच अंतर कम करने और समय के साथ छोटे बदलावों को दर्ज करने का एक अतिरिक्त तरीका चिकित्सकों को दे सकता है।

सिस्टमिक स्क्लेरोसिस के साथ जी रहे लोगों के लिए व्यावहारिक उम्मीद केवल एक नए कैमरे की नहीं है। यह जटिल रोग प्रक्रिया के अधिक सुसंगत मापन की संभावना है। यह काम यह भी दिखाता है कि ऑप्टिकल इंजीनियरिंग को उन नैदानिक सवालों के लिए कैसे अनुकूलित किया जा सकता है, जिनका आसान मात्रात्मक आकलन अब तक कठिन रहा है। फाइब्रोसिस वाली त्वचा के साथ प्रकाश की अंतःक्रिया का अध्ययन करके शोधकर्ताओं ने कम असुविधा और अधिक दोहराव-क्षमता के साथ रोग गतिविधि का आकलन करने की दिशा में रास्ता खोलने की संभावना पैदा की है।

  • SFDI बिना संपर्क के त्वचा के गुणों को मापने के लिए पैटर्न वाली, सुरक्षित रोशनी का उपयोग करता है।
  • अध्ययन में स्क्लेरोडर्मा से पीड़ित लोगों और स्वस्थ प्रतिभागियों के बीच अंतर पाया गया।
  • शोधकर्ताओं ने ऑप्टिकल रीडिंग की तुलना बायोप्सी में कोलेजन, अल्ट्रासाउंड और मानक नैदानिक स्कोरिंग से की।
  • इस पद्धति को नियमित नैदानिक साधन मानने से पहले और शोध की जरूरत है।

यह लेख Medical Xpress की रिपोर्टिंग पर आधारित है। मूल लेख पढ़ें।

Originally published on medicalxpress.com