ग्रीनलैंड के साक्ष्य मीथेन के उत्सर्जन का एक और मार्ग दिखाते हैं

उत्तर-पश्चिमी ग्रीनलैंड के मेलविल बे में समुद्र-तल का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्हें ऐसे साक्ष्य मिले हैं जिनसे संकेत मिलता है कि अंतिम हिम-अधिकतम अवधि के बाद हिमानी पिघले पानी ने मीथेन हाइड्रेट्स की रिहाई को ट्रिगर करने में मदद की। यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मीथेन के निकलने का ऐसा मार्ग सुझाती है जो सीधे बर्फ के पिघलने से जुड़ा है, और इस तरह पूरे आर्कटिक में बढ़ते जलवायु जोखिमों में एक और चिंता जोड़ती है।

मीथेन हाइड्रेट्स, जिन्हें कभी-कभी फायर आइस भी कहा जाता है, तब बनते हैं जब मीथेन अणु उच्च-दाब, निम्न-तापमान स्थितियों में पानी के बर्फ-जैसे जाल में फंस जाते हैं। ये महासागरों के नीचे, पर्माफ्रॉस्ट में और ग्लेशियरों के नीचे पाए जाते हैं। क्योंकि माना जाता है कि इन हाइड्रेट्स में भारी मात्रा में कार्बन मौजूद है, इन्हें अस्थिर करने वाला कोई भी तंत्र आर्कटिक भूविज्ञान से कहीं आगे तक ध्यान खींचता है।

मेलविल बे में शोधकर्ताओं ने क्या पाया

दिए गए स्रोत पाठ में वर्णित शोध ने समुद्र-तल पर लगभग 50 बड़े पॉकमार्क्स पर ध्यान केंद्रित किया, जो एक ग्राउंडिंग ज़ोन वेज के पास थे, यानी वह क्षेत्र जहां अंतिम हिम-अधिकतम के दौरान बर्फ की चादर की एक तैरती जीभ कभी समुद्र-तल से मिलती थी, एक ऐसी अवधि जिसे वहां लगभग 29,000 से 19,000 वर्ष पहले का बताया गया है। सिस्मिक सर्वेक्षणों ने सबसे पहले इन संरचनाओं का पता लगाया, और बाद में तलछटी कोर ने शोधकर्ताओं को इनके कारण की नई व्याख्या करने में मदद की।

प्रत्येक पॉकमार्क कथित तौर पर 37 मीटर तक गहरा था और शुरू में माना गया था कि वे उलटते हिमखंडों द्वारा बनाए गए होंगे। लेकिन तलछट के साक्ष्य ने एक अलग दिशा की ओर इशारा किया। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि क्षेत्र से गुजरता पिघला पानी संभवतः बर्फ की चादर के किनारे की तलछट से मीथेन हाइड्रेट्स को बाहर निकाल ले गया, जिससे गैस निकली और समुद्र-तल पर दिखने वाले इन निशानों के बनने में मदद मिली।

यह तंत्र महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संकेत देता है कि जिसे कभी स्थिर माना गया था, वह मीथेन तब संवेदनशील हो सकती है जब जलवायु परिस्थितियां ग्लेशियरों और बर्फीले किनारों के आसपास की जल-व्यवस्था को बदल देती हैं।

मीथेन हाइड्रेट्स जलवायु वैज्ञानिकों को क्यों चिंतित करते हैं

मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, और मीथेन हाइड्रेट्स ठंड और दबाव से बंद एक बड़ा कार्बन भंडार हैं। स्रोत पाठ में कहा गया है कि कुछ अनुमान हाइड्रेट्स में बंद कार्बन को पृथ्वी पर मौजूद सभी कोयले, तेल और पारंपरिक गैस की कुल मात्रा से लगभग दोगुना बताते हैं। बेशक, इस सारी मीथेन के निकलने की संभावना नहीं है, लेकिन इस भंडार का पैमाना बताता है कि शोधकर्ता अस्थिरता के संकेतों पर इतनी बारीकी से क्यों नजर रखते हैं।

ग्रीनलैंड के निष्कर्षों का मतलब यह नहीं है कि आर्कटिक में मीथेन का अचानक, विनाशकारी विस्फोट निकट है। लेकिन वे यह दिखाते हैं कि शोधकर्ताओं को केवल समुद्री गरमी या पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से आगे के अतिरिक्त रिहाई तंत्रों को भी ध्यान में रखना पड़ सकता है। यहां चिंता यह है कि पिघला पानी स्वयं हाइड्रेट-युक्त तलछट को बाधित कर सकता है और उस गैस को मुक्त कर सकता है जो ग्लेशियली परिस्थितियों में प्रभावी रूप से बंद थी।

अतीत से मिली चेतावनी, किसी तारीख वाली भविष्यवाणी नहीं

यह अध्ययन इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि यह पिछले दौर की भारी बर्फ पिघलने की भूवैज्ञानिक गवाही का उपयोग आज के जोखिम को समझने के लिए करता है। पॉकमार्क्स किसी वर्तमान मीथेन प्लूम की माप नहीं, बल्कि घटनाओं की एक श्रृंखला के निशान हैं। लेकिन ये निशान दिखाते हैं कि बर्फ की चादर में बदलाव दबी हुई कार्बन-भंडारों के साथ ऐसे तरीकों से अंतःक्रिया कर सकता है जो सहज नहीं लगते।

इसी वजह से यह खोज एक चेतावनी है, कोई समय-सारणी नहीं। ग्रीनलैंड पहले से ही उल्लेखनीय पिघलन से गुजर रहा है, और जलवायु परिवर्तन उन ठंडे, दबावयुक्त वातावरणों को बदल रहा है जो हाइड्रेट्स को स्थिर रहने देते हैं। अध्ययन बताता है कि अगर इसी तरह की परिस्थितियां फिर बनती हैं, तो प्राचीन मीथेन भंडार उन रास्तों से संवेदनशील हो सकते हैं जिन्हें शोधकर्ताओं ने अभी केवल आंशिक रूप से ही समझा है।

बड़ा जलवायु संदेश

जलवायु जोखिम पर अक्सर सीधे गरमी के प्रभावों के रूप में चर्चा होती है: अधिक गर्म हवा, पतली बर्फ, ऊंचा समुद्र स्तर। यह अध्ययन एक अलग तरह के खतरे की ओर इशारा करता है, जहां गरमी पीछे हटती बर्फ के नीचे की भूविज्ञान में छिपी फीडबैक प्रक्रियाओं को सक्रिय कर देती है। ये फीडबैक निकट अवधि के उत्सर्जनों पर हावी न भी हों, फिर भी वे दीर्घकालिक तस्वीर को जटिल बनाती हैं।

इसीलिए इस तरह का काम महत्वपूर्ण है। यह उन प्रक्रियाओं की सूची बढ़ाता है जिन पर वैज्ञानिकों को आर्कटिक में नजर रखनी होगी, जो पहले से ही ग्रह के अधिकांश हिस्से की तुलना में तेज़ी से बदल रहा है। यदि पिघला पानी सचमुच बर्फीले किनारों के पास मीथेन हाइड्रेट्स को मुक्त कर सकता है, तो बर्फ का नुकसान केवल गरमी का परिणाम नहीं रह जाता। वह उस तंत्र का हिस्सा भी बन सकता है जो जलवायु बोझ को और बढ़ाता है।

मेलविल बे से मिलने वाला सबक यह नहीं है कि आपदा तय है। सबक यह है कि क्रायोस्फीयर दबी हुई कार्बन-संरचनाओं से पहले सोचे गए से कहीं अधिक तरीकों से जुड़ा हो सकता है, और आर्कटिक के लगातार गरम होने के साथ उन संबंधों को नज़रअंदाज़ करना कठिन होता जा रहा है।

यह लेख न्यू साइंटिस्ट की रिपोर्टिंग पर आधारित है। मूल लेख पढ़ें.

Originally published on newscientist.com