चरम पदार्थ पर एक प्रयोगशाला परीक्षण बर्फीले दानवों में झांकने का नया जरिया देता है

भौतिकविदों ने हीरे को इतनी चरम परिस्थितियों तक पहुंचाया कि पदार्थ ने संक्षेप में सूर्य की सतह के बराबर तापमान और पृथ्वी के केंद्र पर मौजूद दबाव से तीन गुना से भी अधिक दबाव झेल लिया। इस प्रक्रिया में, उनका कहना है कि उन्होंने लगभग दो दशकों से चली आ रही एक वैज्ञानिक असहमति को सुलझा लिया और यूरेनस तथा नेपच्यून के भीतर गहराई में क्या हो रहा हो सकता है, इस तस्वीर के एक अहम हिस्से को और स्पष्ट कर दिया।

यह काम, Nature Physics में प्रकाशित एक शोधपत्र में वर्णित और लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लेबोरेटरी के नेतृत्व में किए गए प्रयोगों के आधार पर रिपोर्ट किया गया, ग्रह-विज्ञान में लंबे समय से चली आ रही एक धारणा पर केंद्रित है: तथाकथित बर्फीले दानवों के भीतर कार्बन-समृद्ध पदार्थ इतना संपीडित हो सकता है कि वह हीरे में बदल जाए, जिससे वह असामान्य घटना पैदा हो, जिसे अक्सर “डायमंड रेन” कहा जाता है। यह विचार वर्षों से प्रचलित है, लेकिन इससे जुड़ा एक मूलभूत भौतिक प्रश्न अनसुलझा रहा। अत्यधिक परिस्थितियों में हीरे के पिघलने के व्यवहार के माप क्वांटम-यांत्रिक मॉडलों से साफ़ तौर पर मेल नहीं खाते थे।

नया प्रयोग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नियंत्रित परिस्थितियों में सीधे अवलोकनों के जरिए उस अंतर को कम करता है। ग्रह-विज्ञानियों के लिए, इससे दूरस्थ दुनियाओं के गहरे आंतरिक हिस्सों के मॉडल बनाने में इस्तेमाल होने वाली भौतिक मान्यताएं बेहतर होती हैं। उच्च-ऊर्जा-घनत्व भौतिकी के शोधकर्ताओं के लिए, यह फ्यूजन प्रयोगों से जुड़ी उसी व्यापक श्रेणी की चरम स्थितियों में पदार्थ को समझने में भी मदद करता है।

शोधकर्ताओं ने वास्तव में क्या किया

टीम ने यह काम रोचेस्टर विश्वविद्यालय की ओमेगा लेज़र फैसिलिटी में किया। दिए गए स्रोत पाठ के अनुसार, शोधकर्ताओं ने लेज़र का उपयोग करके हीरे के नमूने की बाहरी परत को वाष्पित कर दिया। इससे एक आघात तरंग बनी जो सामग्री के शेष हिस्से से होकर गुज़री और उसे लगभग एक अरबवें सेकंड के लिए अत्यधिक दबाव तक संपीडित कर दिया।

उस संक्षिप्त अंतराल के दौरान, वैज्ञानिकों ने कई निदान उपकरणों, जिनमें अल्ट्राफास्ट एक्स-रे डिफ्रैक्शन भी शामिल था, की मदद से यह ट्रैक किया कि क्या हुआ। यह विवरण महत्वपूर्ण है क्योंकि हीरे के पिघलने को समझने के पिछले प्रयासों में ऐसे माप मिले थे जो सिद्धांत से 20% तक अलग थे, और इस संदर्भ में इसका मतलब 1,000 केल्विन से अधिक का अंतर था। इतनी बड़ी असंगति यह तय करना कठिन बना देती है कि ग्रहों के आंतरिक हिस्सों का अनुकरण करने के लिए उपयोग किए जाने वाले मॉडल सचमुच भविष्यवाणी करने वाले हैं या सिर्फ लगभग सही।

नए एक्स-रे डिफ्रैक्शन डेटा के साथ, लेखकों ने निष्कर्ष निकाला कि हीरे के लिए उनका मापा गया गलनांक आधुनिक क्वांटम-भौतिकी-आधारित गणनाओं से मेल खाता है। यह सामंजस्य केवल एक तकनीकी बहस को सुलझाने से अधिक है। यह संकेत देता है कि अत्यधिक दबाव और तापमान पर कार्बन को वर्णित करने वाला सैद्धांतिक ढांचा पहले की तुलना में अधिक मजबूत आधार पर है।

विशाल ग्रहों के लिए हीरा क्यों महत्वपूर्ण है

यूरेनस और नेपच्यून पृथ्वी जैसे नहीं हैं और न ही बृहस्पति और शनि जैसे बड़े गैसीय दानव हैं। माना जाता है कि उनके भीतर तीव्र दबाव के तहत वाष्पशील पदार्थों के मिश्रण मौजूद हैं, और वैज्ञानिक लंबे समय से संदेह करते रहे हैं कि ये वातावरण कार्बन-युक्त यौगिकों को नाटकीय तरीकों से बदल सकते हैं। किसी ग्रह के भीतर हीरों के बरसने की लोकप्रिय छवि एक सरलीकरण है, लेकिन यह इस वास्तविक वैज्ञानिक प्रश्न को पकड़ती है कि जब पदार्थ पर विशाल-ग्रह जैसी परिस्थितियां लागू होती हैं, तो वह कैसे अलग होता है, पिघलता है, और गतिमान होता है।

इसीलिए हीरे का अवस्थागत व्यवहार केवल पदार्थ-विज्ञान की एक अमूर्त समस्या नहीं है। यदि शोधकर्ता यह बेहतर ढंग से तय कर सकें कि हीरा कब ठोस रहता है, कब पिघलता है, और वह आसपास के पदार्थ से कैसे अंतःक्रिया करता है, तो वे बर्फीले दानवों के भीतर ऊष्मा के परिवहन, परतों की संरचना, और आंतरिक गतिकी के मॉडल बेहतर बना सकते हैं। ये गुण यह तय करने में मदद करते हैं कि ऐसे ग्रह समय के साथ कैसे विकसित होते हैं और उनकी आंतरिक संरचना के जरिये अप्रत्यक्ष रूप से उनके चुंबकीय और वायुमंडलीय व्यवहार को भी प्रभावित कर सकते हैं।

Scientists Melted A Diamond and Cracked a Secret of Ice Giants
हीरे के लक्ष्य के पिघलने की कलाकार-कल्पना। क्रेडिट: James Wickboldt/LLNL

दिए गए स्रोत पाठ में इस परिणाम को पहली बार बताया गया है जब वैज्ञानिकों ने इस घटना को पैदा करने वाली मानी जाने वाली प्रक्रिया की नकल की। उस रिपोर्टिंग के आधार पर, यह प्रयोग इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि यह किसी पूरे ग्रह को लघु रूप में दोहराता नहीं, बल्कि संबंधित उच्च-दबाव परिवर्तनों में से एक को अलग करता है और उसे पहले के प्रयासों की तुलना में बेहतर निदान उपकरणों से पकड़ता है।

प्रायः ग्रह-विज्ञान इसी तरह आगे बढ़ता है। शोधकर्ता नेपच्यून में ड्रिल नहीं कर सकते या उसके गहरे मेंटल-जैसे क्षेत्रों में प्रोब नहीं भेज सकते, इसलिए वे दूरबीन अवलोकनों, सैद्धांतिक मॉडलों और प्रयोगशाला प्रयोगों के संयोजन पर निर्भर रहते हैं, जो आवश्यक परिस्थितियों के छोटे-छोटे हिस्सों को पुनः निर्मित करते हैं। जब उन हिस्सों में से कोई एक और सटीक हो जाता है, तो संपूर्ण ग्रह-चित्र अधिक स्पष्ट होता है।

फ्यूजन शोधकर्ता भी क्यों ध्यान दे रहे हैं

इसके प्रभाव केवल ग्रहों तक सीमित नहीं हैं। स्रोत पाठ कहता है कि वही भौतिकी शोधकर्ताओं को फ्यूजन ऊर्जा उत्पादन को तीन गुना करने में मदद कर सकती है। इस दावे को संकीर्ण अर्थ में पढ़ना चाहिए: दी गई सामग्री रिएक्टर-स्तरीय प्रदर्शन में तीन गुना वृद्धि का कोई पूर्ण तकनीकी मार्ग या प्रयोगात्मक प्रदर्शन नहीं देती। जो बात यह समर्थित करती है, वह यह विचार है कि तीव्र आघात संपीडन के तहत पदार्थ कैसे व्यवहार करते हैं, इसे समझना इनर्शियल कन्फाइनमेंट फ्यूजन शोध को सूचित कर सकता है, जहां लेज़र-चालित संपीडन और अल्ट्राफास्ट निदान केंद्रीय उपकरण हैं।

दूसरे शब्दों में, यह ओवरलैप वैज्ञानिक जितना है उतना ही पद्धतिगत भी है। चरम अवस्थाओं के पदार्थ को उत्पन्न करने, जांचने और मॉडल करने की वही क्षमता खगोलभौतिकी के प्रश्नों और फ्यूजन-ऊर्जा शोध, दोनों को आगे बढ़ा सकती है। ओमेगा जैसी सुविधाएं ठीक इसी संगम पर मौजूद हैं, जहां ग्रहों के आंतरिक भागों, संघनित पदार्थ, और फ्यूजन भौतिकी पर प्रयोग एक-दूसरे को मजबूत कर सकते हैं।

इसी तरह का पार-अनुशासनिक मूल्य इन परिणामों को खास बनाता है। यह केवल किसी असामान्य पदार्थ के बारे में जिज्ञासा नहीं है। यह उन अनेक शोध क्षेत्रों में प्रयुक्त सिमुलेशनों में भरोसा बढ़ाता है, जो चरम परिस्थितियों में सटीक अवस्था-समीकरणों और अवस्था-सीमाओं पर निर्भर करते हैं।

इस परिणाम के बाद क्या बदलता है

तत्काल बदलाव यह नहीं है कि वैज्ञानिक अचानक नेपच्यून के भीतर हीरा-बारिश के बारे में सब कुछ जान गए हैं। अधिक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि प्रयोग और सिद्धांत के बीच एक जिद्दी असंगति अब काफी हद तक कम होती दिख रही है। इससे मॉडल बनाने वालों को आगे के काम के लिए एक साफ़ आधार मिलता है।

यह बेहतर निदान उपकरणों की भूमिका को भी रेखांकित करता है, जो पुराने प्रश्नों पर फिर से लौटने में मदद करते हैं। पहले के मापों में इतनी अनिश्चितता थी कि सिद्धांतकार और प्रयोगकर्ता अपने परिणामों को पूरी तरह मेल नहीं करा पाए थे। ठीक समय पर किए गए एक संपीडन-आघात प्रयोग के दौरान लिए गए बेहतर एक्स-रे डिफ्रैक्शन माप अब उस मतभेद को सुलझाते दिखते हैं।

विज्ञान-रिपोर्टिंग के लिए, यह वही तरह की प्रगति है जिस पर ध्यान देना चाहिए: किसी काल्पनिक ग्रह-छवि के प्रचार-प्रसार नहीं, बल्कि चरम परिस्थितियों में पदार्थ को मापने और मॉडल करने के तरीके में ठोस सुधार। बरसते हीरों की छवि जनता का ध्यान खींचती है। असली कहानी यह है कि दूरस्थ ग्रहों से जुड़ी एक पदार्थ-भौतिकी समस्या अब अधिक संभालने योग्य हो गई है, और यह सुधार उच्च-ऊर्जा अनुसंधान के अन्य क्षेत्रों तक भी फैल सकता है।

  • प्रयोग में ओमेगा लेज़र फैसिलिटी पर हीरे पर लेज़र-चालित आघात संपीडन का उपयोग किया गया।
  • शोधकर्ताओं ने पृथ्वी के केंद्र के दबाव से तीन गुना से अधिक और सूर्य की सतह के समान तापमान की स्थितियां देखीं।
  • नए एक्स-रे डिफ्रैक्शन मापों ने हीरे के पिघलने के देखे गए व्यवहार को आधुनिक क्वांटम-आधारित मॉडलों से मेल कराया।
  • ये निष्कर्ष बर्फीले दानवों के आंतरिक मॉडलों को मजबूत करते हैं और फ्यूजन-संबंधी चरम-पदार्थ शोध में भी सहायक हो सकते हैं।

यह लेख Phys.org की रिपोर्टिंग पर आधारित है। मूल लेख पढ़ें.

Originally published on phys.org