फ्यूज़न के भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए एक नई चेतावनी

फ्यूज़न ऊर्जा को लंबे समय से दो समय-सीमाओं पर बेचा गया है: पहले साबित करो कि यह काम कर सकती है, फिर उसे कम-कार्बन बिजली के व्यावहारिक स्रोत में बढ़ाओ। MIT Technology Review द्वारा उजागर नया शोध तर्क देता है कि अगर पहला चरण सफल भी हो जाए, तो दूसरा चरण कई आशावादी परिदृश्यों से अधिक समय और अधिक लागत ले सकता है।

Nature Energy में प्रकाशित यह अध्ययन प्रौद्योगिकी तैनाती के एक केंद्रीय प्रश्न पर केंद्रित है: जैसे-जैसे किसी तकनीक को बड़े पैमाने पर बनाया जाता है, उसकी लागत कितनी तेज़ी से घटती है। यही उत्तर तय कर सकता है कि कोई ऊर्जा स्रोत वैज्ञानिक वादे से व्यावसायिक प्रासंगिकता तक पहुँचेगा या नहीं। फ्यूज़न के मामले में, शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि लागत में गिरावट सौर मॉड्यूल या लिथियम-आयन बैटरियों जैसी तकनीकों की तुलना में कहीं अधिक धीमी हो सकती है।

बहस के केंद्र में मौजूद मापदंड

यह अध्ययन “experience rate” नामक एक अवधारणा की जांच करता है, जिसे उपलब्ध स्रोत में इस तरह परिभाषित किया गया है कि जब स्थापित क्षमता दोगुनी होती है, तो किसी तकनीक की लागत जिस प्रतिशत से घटती है। उच्च experience rate का मतलब है तैनाती और निर्माण-सीख के जरिए तेज लागत सुधार। कम दर का मतलब है कि तकनीक काम करने के बावजूद लागत में कमी धीरे-धीरे आती है।

लेख में तुलना के बिंदु काफ़ी स्पष्ट हैं। ऐतिहासिक रूप से, onshore wind की experience rate 12% है, lithium-ion batteries की 20%, और solar modules की 23%। दूसरी ओर, fission 2% पर है। ये आँकड़े इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे दिखाते हैं कि प्रयोगशाला से बाहर निकलकर फ़ैक्ट्रियों, परियोजनाओं, इंजीनियरिंग जटिलता और नियमन की वास्तविक दुनिया में जाने के बाद ऊर्जा तकनीकों का व्यवहार कितना अलग हो सकता है।

फ्यूज़न की सीखने की गति धीमी क्यों हो सकती है

क्योंकि वाणिज्यिक फ्यूज़न संयंत्र अभी बड़े पैमाने पर मौजूद नहीं हैं, शोधकर्ता केवल ऐतिहासिक experience curve को माप नहीं सकते। इसके बजाय, अध्ययन फ्यूज़न के संभावित व्यवहार का अनुमान उन गुणों को देखकर लगाता है जो धीमी या तेज़ लागत गिरावट से जुड़े होते हैं। स्रोत इनमें तीन का उल्लेख करता है: इकाई का आकार, डिज़ाइन जटिलता, और अनुकूलन की आवश्यकता।

किसी तकनीक का आकार और जटिलता जितनी अधिक होगी, और प्रत्येक उपयोग के लिए उसे जितना अधिक अनुकूलित करना पड़ेगा, उसकी अपेक्षित experience rate उतनी ही कम होने की प्रवृत्ति रखती है। सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के फ्यूज़न विशेषज्ञों के साक्षात्कारों के आधार पर, लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि फ्यूज़न संयंत्र इन आयामों पर तेज़ी से सीखने वाली मॉड्यूलर तकनीकों की तुलना में कमजोर प्रदर्शन करने की संभावना रखते हैं।

लेख के अनुसार, फ्यूज़न संयंत्र संभवतः अपेक्षाकृत बड़े होंगे और कोयला या fission संयंत्रों जैसी सुविधाओं के अधिक समान होंगे जो गर्मी उत्पन्न करती हैं। सुरक्षा और नियामकीय मांगें सरल होने के कारण उन्हें fission से कम अनुकूलन की ज़रूरत हो सकती है, लेकिन सौर पैनलों जैसी तकनीकों की तुलना में फिर भी अधिक अनुकूलन चाहिए होगा। जटिलता के मामले में भी तेज़ मूल्य गिरावट के लिए रुख प्रतिकूल है।

यह अभी क्यों मायने रखता है

लागत पर बहस किसी ऐसी तकनीक के लिए जल्दबाज़ी लग सकती है जो अभी व्यावसायिक सफलता का पीछा कर रही है, लेकिन यही कारण है कि यह मायने रखती है। उपलब्ध स्रोत बताता है कि सार्वजनिक और निजी धन के अरबों डॉलर दांव पर हैं। यदि नीति-निर्माता और निवेशक मान लेते हैं कि फ्यूज़न बैटरियों या सौर ऊर्जा जैसी लागत-सीख के रास्ते पर चलेगी, तो वे भविष्य की ऊर्जा योजनाएँ अवास्तविक अपेक्षाओं पर बना सकते हैं।

यह इस बात का तर्क नहीं है कि फ्यूज़न असंभव है या अप्रासंगिक है। लेख इससे अधिक सटीक है। अगर कंपनियाँ संयंत्र बना और चला सकें, तो फ्यूज़न भविष्य में स्थिर, शून्य-उत्सर्जन बिजली स्रोत दे सकती है। चेतावनी यह है कि सफल प्रदर्शन को अपने-आप तेज़ सस्तापन नहीं समझ लेना चाहिए।

अध्ययन की एक महत्वपूर्ण सीमा

स्रोत विश्लेषण की एक महत्वपूर्ण सीमा भी बताता है। अध्ययन ने केवल magnetic confinement और laser inertial confinement को देखा, जिन्हें दो प्रमुख दृष्टिकोण बताया गया है और जिन्हें आज के अधिकांश धन का लाभ मिल रहा है। अन्य दृष्टिकोण अलग लागत परिणाम दे सकते हैं।

यह सावधानी इसलिए मायने रखती है क्योंकि फ्यूज़न कोई एकल तकनीकी मार्ग नहीं है। अलग-अलग रिएक्टर अवधारणाएँ संयंत्र के आकार, उपप्रणाली की जटिलता, सामग्री की माँग और संचालन मॉडल में भिन्न हो सकती हैं। सिद्धांततः कोई कम पारंपरिक डिज़ाइन उन मान्यताओं को तोड़ सकता है जो प्रमुख दृष्टिकोणों को पीछे रोकती हैं। लेकिन अध्ययन का तर्क यह है कि सबसे अधिक वित्तपोषित रास्ते उन तकनीकों जैसे नहीं दिखते जो जल्दी सस्ती होती हैं।

धीमी सीखने की वक्र का मतलब क्या होगा

यदि इस शोध का तर्क सही निकलता है, तो फ्यूज़न का मार्ग उपभोक्ता निर्माण-कहानी से अधिक किसी बड़े औद्योगिक बुनियादी ढाँचे के निर्माण जैसा दिख सकता है। इसका अर्थ होगा तेज़ लागत-पतन की बजाय इस पर अधिक ध्यान कि फ्यूज़न उच्च लागत के बावजूद कहाँ मूल्य जोड़ सकती है, जैसे विश्वसनीय साबित होने पर स्थिर शून्य-कार्बन बिजली देना।

यह वैज्ञानिक सफलता और बाज़ार सफलता के बीच का अंतर भी स्पष्ट करेगा। नेट ऊर्जा का प्रदर्शन या स्थिर संचालन हासिल करना महत्वपूर्ण मील के पत्थर बने रहेंगे, लेकिन वे अंततः उस प्रश्न को हल नहीं करेंगे जो तैनाती के पैमाने को तय करता है: क्या यह तकनीक इतनी जल्दी और इतनी सस्ती हो सकती है कि वास्तविक बिजली प्रणालियों में प्रतिस्पर्धा कर सके?

यही नए अध्ययन का मूल योगदान है। यह ध्यान को फ्यूज़न को एक शुद्ध वैज्ञानिक सीमा के रूप में देखने से हटाकर एक औद्योगिक सीखने की समस्या के रूप में केंद्रित करता है। ऐसा करके यह आने वाले वर्षों के लिए एक कम रोमांटिक लेकिन अधिक उपयोगी प्रश्न पेश करता है: सिर्फ़ यह नहीं कि फ्यूज़न काम कर सकती है या नहीं, बल्कि यह भी कि क्या यह उतनी तेज़ी से सस्ती हो सकती है जितनी ग्रिड को वास्तव में चाहिए।

यह लेख MIT Technology Review की रिपोर्टिंग पर आधारित है। मूल लेख पढ़ें.

Originally published on technologyreview.com