महामारी संधि का अधूरा हिस्सा अब फिर से चर्चा में है
वार्ताकार 27 अप्रैल को जिनेवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन के महामारी समझौते के अंतिम अनसुलझे हिस्से को सुलझाने के लिए अतिरिक्त एक सप्ताह की बातचीत के लिए एकत्र हुए: देश महामारी की संभावना वाले रोगजनकों को कैसे साझा करेंगे और उस साझाकरण से मिलने वाले लाभ, जिनमें टीके, परीक्षण और उपचार शामिल हैं, कैसे वितरित किए जाएंगे।
इस मुद्दे को तकनीकी रूप से Pathogen Access and Benefit-Sharing system, या PABS, कहा जाता है। व्यवहार में, यह उस प्रश्न के केंद्र में है जिसने COVID-19 के दौरान वैश्विक आक्रोश को आकार दिया था: यदि देश जीवनरक्षक उपकरण विकसित करने के लिए आवश्यक जैविक डेटा और नमूने योगदान करते हैं, तो संकट आने पर उन्हें परिणामी उत्पादों तक न्यायसंगत पहुंच की क्या गारंटी मिलती है?
यह अंतिम तंत्र इतना महत्वपूर्ण क्यों है
व्यापक संधि को WHO सदस्यों ने मई 2025 में तीन साल से अधिक की बातचीत के बाद अपनाया था। इसका उद्देश्य भविष्य की स्वास्थ्य आपात स्थितियों के दौरान समन्वय, निगरानी और पहुंच में सुधार करना था, ताकि कोरोनावायरस महामारी के दौरान देखी गई बिखरी हुई अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया की पुनरावृत्ति न हो। लेकिन सबसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील तत्व अधूरा छोड़ दिया गया था।
यह चूक मामूली नहीं थी। दिए गए स्रोत पाठ में PABS को संधि का केंद्र बताया गया है। इसके बिना, समझौता वैश्विक स्वास्थ्य में सबसे विवादास्पद वास्तविक-विश्व आदान-प्रदानों में से एक के लिए एक तयशुदा तंत्र के बिना एक महत्वाकांक्षी ढांचा बनकर रह जाने का जोखिम उठाता है: त्वरित रोगजनक साझाकरण के बदले सार्थक, न्यायसंगत लाभ।
WHO के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने बातचीत की शुरुआत एक स्पष्ट चेतावनी के साथ की। उन्होंने कहा कि दुनिया अगले महामारी के लिए अप्रस्तुत रहकर इस अवसर को खोने का जोखिम नहीं उठा सकती। यह संदेश एक परिचित लेकिन अब भी अनसुलझे तनाव को दर्शाता है। देश तैयारी की जरूरत पर मोटे तौर पर सहमत हैं, लेकिन तैयारी के लिए जिन प्रतिबद्धताओं की आवश्यकता है, उन पर वे बंटे हुए हैं।
मुख्य विभाजन: भरोसा, निष्पक्षता और प्रोत्साहन
स्रोत सामग्री के अनुसार, समृद्ध देश और विकासशील राष्ट्र अब भी आमने-सामने हैं। विकासशील देशों को आशंका है कि उनसे फिर एक बार वायरस या अन्य रोगजनक डेटा साझा करने के लिए कहा जाएगा, लेकिन भविष्य की आपात स्थिति में टीके और उपचार उनके पास न्यायसंगत ढंग से पहुंचेंगे, इसकी पक्की गारंटी नहीं होगी। यह अविश्वास वास्तविक अनुभव पर आधारित है। कई देशों, खासकर अफ्रीका में, ने COVID-19 टीकों की दौड़ में खुद को पीछे छूटा हुआ महसूस किया।
दूसरी ओर, कुछ देश यह पूछ रहे हैं कि क्या फार्मास्यूटिकल कंपनियों के पास बिना निवेश पर अधिक स्पष्ट प्रतिफल के, महामारी ढांचे में सार्थक रूप से भाग लेने की क्षमता और प्रेरणा होगी। WHO की मुख्य वैज्ञानिक सिल्वी ब्रियैंड ने इस गतिरोध को यह कहकर संक्षेप में बताया कि “blame is shared,” जिससे यह स्पष्ट होता है कि राजनीतिक भरोसा और औद्योगिक प्रोत्साहन दोनों दांव पर हैं।
यही कारण है कि PABS कठिन है। यह केवल एक कूटनीतिक पाठ की समस्या नहीं है। यह निष्पक्षता, गति, संप्रभुता और वाणिज्यिक वास्तविकता को संकट-प्रतिक्रिया के लिए एक ही संचालन तंत्र में दर्ज करने का प्रयास है। ये लक्ष्य स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।
जिनेवा सप्ताह में क्या दांव पर है
समयसीमा कड़ी है। देशों के पास शुक्रवार तक PABS पर ऐसा परिणाम तय करने का समय है जिसे World Health Assembly में मंजूरी दी जा सके, जो 18 मई को शुरू हो रही है। इससे समझौते के लिए दबाव बनता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि इससे भरोसा पैदा हो। स्रोत पाठ में प्रगति को धीमी बताया गया है और कहा गया है कि समझौता करना “very hard” होगा, हालांकि एक राजनयिक ने संकेत दिया कि यूरोपीय संघ अधिक लचीलेपन का प्रदर्शन करने की कोशिश कर रहा था।
यह संकेत महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रमुख गुटों की ओर से होने वाली प्रगति यह तय कर सकती है कि बहुपक्षीय स्वास्थ्य समझौता अंतिम चरण में बचता है या नहीं। फिर भी, यदि कोई समझौता हो भी जाता है, तो उसकी सामग्री की बारीकी से जांच होगी। एक कमजोर व्यवस्था को असमानता को संस्थागत बनाने के लिए आलोचना झेलनी पड़ सकती है। एक मजबूत व्यवस्था सरकारों या उद्योग जगत के उन पक्षों में चिंता पैदा कर सकती है जो दायित्वों और लागतों को लेकर चिंतित हैं।
उस अर्थ में, जिनेवा केवल यह तय नहीं कर रहा है कि PABS तंत्र होगा या नहीं। वह यह भी तय कर रहा है कि दुनिया भविष्य के प्रकोपों के लिए किस तरह की मिसाल चाहती है: एक ऐसी एकजुटता-आधारित मॉडल जिसमें निष्पक्षता की अपेक्षाएँ अधिक हों, या एक अधिक ढीली व्यवस्था जो सद्भावना और तदर्थ सौदेबाजी पर अधिक निर्भर हो।
COVID से मिला सबक अब भी राजनीति को संचालित करता है
इन वार्ताओं के आसपास की अधिकतर तात्कालिकता इस स्मृति से आती है कि पिछली महामारी ने वैश्विक प्रणालियों को कैसे उलट दिया था। COVID-19 ने उजागर किया कि जब टीके, परीक्षण और उपचार दुर्लभ हो जाते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय सहयोग कितनी जल्दी प्रतिस्पर्धा में बदल सकता है। जिन देशों के पास उत्पादन क्षमता या खरीद शक्ति थी, वे पहले आगे बढ़े। अन्य प्रतीक्षा में रहे।
संधि का प्रयास इसी टूटन को दूर करने के लिए था, लेकिन यह हमेशा स्पष्ट था कि सिद्धांतों पर सहमति, वितरण पर सहमति से आसान होगी। रोगजनक साझा करना भले ही अमूर्त लगे, लेकिन इसके राष्ट्रीय संप्रभुता, वैज्ञानिक पहुंच, सार्वजनिक स्वास्थ्य तैयारी और वैश्विक दवा निर्माताओं की वाणिज्यिक पाइपलाइनों पर तात्कालिक प्रभाव पड़ते हैं।
इसीलिए विकासशील देश मजबूत गारंटियों के लिए दबाव बनाए हुए हैं। उनके दृष्टिकोण से, लागू करने योग्य लाभ-साझाकरण के बिना भागीदारी, अधिक सुसज्जित कानूनी ढांचे के तहत वही पैटर्न दोहरा सकती है।
यह वार्ता स्वास्थ्य मंत्रालयों से आगे क्यों जाती है
इसका परिणाम केवल स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए नहीं, बल्कि शोधकर्ताओं, बायोटेक डेवलपर्स, निर्माताओं और उन सरकारों के लिए भी महत्वपूर्ण होगा जो कूटनीतिक और औद्योगिक नीति, दोनों को संभाल रहे हैं। एक कार्यशील रोगजनक-साझाकरण प्रणाली यह प्रभावित करती है कि नमूने कितनी तेजी से आगे बढ़ते हैं, प्रतिकारक उपाय कितनी जल्दी डिजाइन किए जा सकते हैं, और जब वे प्रतिकारक उपाय लागू किए जाते हैं, तब वैधता कैसे बनाए रखी जाती है।
यदि देशों को प्रणाली पर भरोसा नहीं है, तो वे आपात स्थिति के दौरान तेजी से साझा करने में हिचकिचा सकते हैं। ऐसी हिचकिचाहट निगरानी और प्रतिक्रिया को ठीक उसी समय धीमा कर सकती है जब गति सबसे अधिक मायने रखती है। दूसरे शब्दों में, संधि का अनसुलझा मुद्दा परिधीय नहीं है। यह सीधे प्रभावित करता है कि अगली वैश्विक चेतावनी सहयोग से शुरू होती है या संदेह से।
सफलता की संभावित कसौटी
जिनेवा के किसी भी परिणाम का असली पैमाना यह होगा कि क्या COVID-19 के दौरान हाशिये पर महसूस करने वाले देश मानते हैं कि नया ढांचा उनकी स्थिति में वास्तविक बदलाव लाता है। केवल कागज़ पर कार्यशील, लेकिन राजनीतिक रूप से असंतोषजनक समझौता भी व्यवस्था को नाजुक छोड़ सकता है। इसके विपरीत, ऐसा समझौता जिसे निष्पक्ष और व्यावहारिक दोनों माना जाए, पूरे महामारी ढांचे की वैधता को मजबूत कर सकता है।
WHO नेतृत्व ने स्पष्ट किया है कि पूर्णता मानक नहीं है। टेड्रोस ने कहा कि कोई भी समझौता कभी ऐसा नहीं होता। लेकिन कठिन सवाल यह है कि क्या वार्ताकार ऐसा समझौता तैयार कर सकते हैं जो भरोसा बहाल करने के लिए पर्याप्त निष्पक्ष हो और अगले संकट से टिके रहने के लिए पर्याप्त व्यावहारिक हो।
यही इस सप्ताह का असली उद्देश्य है। यह नहीं कि दुनिया सैद्धांतिक रूप से तैयारी का समर्थन करती है या नहीं, बल्कि यह कि क्या वह अगले आपातकाल के फिर वही सवाल उठाने से पहले एकजुटता के नियमों पर सहमत हो सकती है।
यह लेख Medical Xpress की रिपोर्टिंग पर आधारित है। मूल लेख पढ़ें.
Originally published on medicalxpress.com


